औरंगाबाद शहर के ई-स्क्वेअर ‘मल्टीप्लेक्स थियटर’ में परसो शाम मैं और मेरे मीत्र ‘तलाश’ फिल्म देखने पहुँचे. मैं ज्यादातर सिंगल स्क्रिन सिनेमागृह में ही
जाता हूँ, इसमें मेरी यह धारणा हैं कि मल्टीप्लेक्स युग में ‘सिंगल स्क्रिन’ सिनेमाघर अतीत न बन
जाए. खौर.. कभी कभार मूड बन जाए तो मल्टीप्लेक्स हो आता हूँ. औरंगाबाद शहर के दौरे पर ता तो सौंचा चलो दोस्तो के साथ फिल्म देख आये. इसी मूड में शहर के अभिनय ई-स्क्वेअर पहुंचा. 120, 80 और 60 तिकट की दरे थी. हमने 120 वाली दो तिकटे खरिदी और अंदर
चले गये.
फ़िल्म शुरू होने मे अभी अंतराल था. तब तक कुछ खाया जाए, इसी सोच में पश्चिमी खाद्य संस्कृती के शॉप से दो मिनी बर्गर ऑर्डर किये. कुछ देर में
बर्गर हमारे सामने था. सत्त्तर रुपये देकर हमने उसे ऊठा लिया. खाने के बाद पिने के लिये पानी ‘तलाश’ किया. सहन में चारो ओर देखा पानी का कोई नामो निशान नही दिख रहा था. पुछने पर पता चला की
‘आपको पानी पैसो से खरीदकर
पिना पडेगा, नही तो बाहर जाकर पी लो.’ उस शॉपर नें कहा, ‘उपरवाले फ्लोर पर स्टॉल हैं, वहाँ जाकर खरीद लो..!’ मै सकपका गया? प्यास के मारे मेरा
बुरा हाल था, ‘मरता क्या न करता’ उपर जाकर दस की बोतल (एक लिटर) बीस रुपयें दिये, पानी अंदर जाने के बाद अच्छा महसुस हुआ.
थोडी देर बाद मैंने सोचा यूँ ही सोच लिया, ‘गाडी पार्क करने के दस
रुपये, तिकट के 240 रुपये, बर्गर के सत्तर रुपये कूल 320 रुपये देकर भी पिने को पानी नही मिला. दुगने दाम देकर पानी खरीदना
पडा.
क्या हमारे जेब पर पलने वाले ये सिनेमाघर, हमे दो घुंट पिने का
पानी भी मुहैय्या नही करा सकते. सार्वजनिक स्थल पर पानी मुहैय्या कराना किस के जिम्मे हैं.
पानी पिने के मौलिक अधिकार से हमे क्यो वंचित रखा गया हैं. सरकारी आदेश यही कहता
है? इसपर कोई संवाददाता,
मीडिया संस्थान आवाज उठायेगा ईसकी मुझे ‘तलाश’ है.
सरकारी नियमों को ताक पर रखकर यह मल्टीप्लेक्सवाले ग्राहको से लाखों
रुपये कमाते हैं. यहाँ खाने के चिजे भी बाहर से नही ला सकते. यही का खरीदकर खाना
हैं, यह लोग जो मर्जी चाहे किमते लगायेंगे. यह तानाशाही नही तो क्या हैं? एक तरह से देखा जाए
तो यह सिनेमाघर आपको जंक
फूड खाने के लिए मजबूर कर रहे हैं.
इसी थियटर में मैने पाया की वॉशरूम बहाने के लिए हजारो लिटर पानी हैं,
पर लोगो को पिने के लिए क्यो नही हैं. लोग पानी पिये तो इन्हे क्या तकलीफ हैं,
क्या प्यस से बढकर हैं की बाथरूम के टंकी में पानी बहाया जाए. इस सिनेमाघर में मुझे
एक और नजारा देखने को मिला. पेशाब के बाद जब मैने हाथ धुलने ‘वॉश पॉट’ की ओर हाथ बढाया
तो, हाथ धुलने के बाद भी नल बंद होने का नाम नही ले रहा था. उसी पानी से और तीन
लोगो ने हाथ धोए, फ़िर भी पानी बंद नही हुआ. तेज गती से नल से पानी बाहर गीर रहा था. आधुनिक नल कुछ टाईम के बाद अपनेआप बंद हो जाते है. इसका मुझे गुमान था, मन में शंका लिए भी थोडी
देर बाद फिर एक बार बटन दबाया, सोचा अब तो जरूर बंद होगा. पर कुछ असर न हुआ. उस स्वच्छ्तागृह में
लगे सभी नलो का यही हाल था. नलके से पानी बाहर आने का ‘टाईम’ बढ गया था. इसे देख लोग परेशान नजर आ रहे थे. पुरे देढ
मिनट बाद नल कही जाकर बंद हुआ.
हाथ धुलने के लिये पाँच सेकंद का समय काफ़ी है. और इसमे आधा लिटर पानी से भी कम पानी लगता है. यह नल तेज गती से पुरे
नब्बे सेकंद चला. जिससे पुरे अठाराह लोगो के हाथ धुलने का पानी एक आदमी पर खर्च हुआ.
मतलब जीस तेज गती से पानी बाहर आ रहा था उस नब्बे सेकंद मे नौं लिटर पानी बाहर आया. स्वच्छतागृह मे एक आदमी को यह
सिनेमाघर सिर्फ़ हाथ धुलने के लिए नौं लिटर पानी उपलब्ध कराता है. और पिने के लिए एक दो घुंट भी नही...! सौ रुपये
से भी महंगा तिकट खरीदकर उसे पानी खरीदकर पिना पडता हैं. और पानी के की दस रुपये
की बोतल बीस रुये देकर खरिदनी पडती है. जैसे सिनेमाघर नही बल्की बनिया की तरह
व्यापार-धंदा चला रहे हैं यह लोग.
इस तरह के कई सिनेमाघर देश में हैं. महाराष्ट्र की बात करे तो पुणे, मुंबई,
कोल्हापूर, नागपूर आदी शहरो में यही हाल हैं. मैं खुद इसका अनुभव ले चुँका हूँ. कई
सिनेमाघर सरकार के आदेश धता बताकर यह चलाए जा रहे है. सरकारी नियमो को पैरो तले रोंदा
जा रहा है. फ़िर भी लोग चूप हैं, सरकार की तो मत पुछो. क्या इसके लिए हम
आवाज भी नही उठा सकते. इसी जगह एक तरफ़ लिटरो से पानी बरबाद किया जा रहा है , और दुसरे तरफ़ दो
घुंट के लिए हम तरस रहे है .
कलीम अजीम
वाचनीय
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अपनी बात
- कलीम अजीम
- कहने को बहुत हैं, इसलिए बेजुबान नही रह रह सकता. लिखता हूँ क्योंकि वह मेरे अस्तित्व का सवाल बना हैं. अपनी बात मैं खुद नही रखुंगा तो कौन रखेगा? मायग्रेशन और युवाओ के सवाल मुझे अंदर से कचोटते हैं, इसलिए उन्हें बेजुबान होने से रोकता हूँ. मुस्लिमों कि समस्या मेरे मुझे अपना आईना लगती हैं, जिसे मैं रोज टुकडे बनते देखता हूँ. Contact : kalimazim2@gmail.com