..और मोसम अचानक रूमानी हो गया
पुणे ता. ४ ( कलिम अजीम) हमेशा की तरह दोपहर के खाने के बाद हम गप शप कर रहे थे. तभी बदल घीर आये देखते देखते बारिश शुरू
हुई. गंभीर विषय पर चल रही चर्चा थम गयी, और माहोल बदल गया.
विभाग के कँटीन बेहद कम जगह में हम सिकुड़े
बैठे थे. ऊपर छत से पानी टपक रहा था. बारीश
के छींटे हम पर पड़ रहे थे, साथ में चाय का समां चल रहा था.
हंसी मजाक के साथ चाय पे चाय हम गटक रहे थे. और अचानक गानों और कविताओ का दोर चल
पड़ा. सभी एक सूर में गा रहे थे. समां रंगीन हुआ जा रहा था. कोई बारीश में भीग रहा
था तो कोई बारीश के गीत गा रहा था. पुरे देढ घंटे बारीश के साथ रूमानी समा बांध
चूका था. यह नजारा पुणे विश्वविद्यालय के जनसंचार एव पत्रकारिता विभाग का था.
अचानक बारीश बरसने का मजा आज हम ने
लिया. कुछ " जिन्दा तस्वीरे मई पेश कर रहा हु .......!
कलिम अजीम
पुणे
पुणे
वाचनीय
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चर्चित
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अपनी बात
- कलीम अजीम
- कहने को बहुत हैं, इसलिए बेजुबान नही रह रह सकता. लिखता हूँ क्योंकि वह मेरे अस्तित्व का सवाल बना हैं. अपनी बात मैं खुद नही रखुंगा तो कौन रखेगा? मायग्रेशन और युवाओ के सवाल मुझे अंदर से कचोटते हैं, इसलिए उन्हें बेजुबान होने से रोकता हूँ. मुस्लिमों कि समस्या मेरे मुझे अपना आईना लगती हैं, जिसे मैं रोज टुकडे बनते देखता हूँ. Contact : kalimazim2@gmail.com
